जय देव जय देव जय निजबोधा रामा
स्वस्वरूपोन्मुखबुद्धि वैदेही नेली।
देहात्मकाभिमाने दशग्रीवे हरिली।
शब्दरूप मारुतीने सच्छुद्धि आणिली।
तव चरणांबुजी येऊन वार्ता श्रृत केली॥
जय देव जय देव जय निजबोधा रामा।
परमार्थे आरती सद्भावे आरती परिपूर्णकामा॥
उत्कट साधुनी शिळा सेतू बांधोनी।
लिंगदेह लंकापुरी विध्वंसूनी।
कामक्रोधादिक राक्षस मर्दूनी।
देह अहंभाव रावण निवटोनी॥
जय देव जय देव जय निजबोधा रामा।
प्रथम सीताशोधा हनुमंत गेला।
लंका दहन करुनी अखया मारिला।
मारिला जंबुमाळी भुवनी त्राहाटिला।
आनंदाची गुढी घेऊनिया आला॥
जय देव जय देव जय निजबोधा रामा।
निजबळे निजशक्ति सोडविली सीता।
म्हणुनी येणे झाले अयोध्ये रघुनाथा।
आनंदे ओसंडे वैराग्य भरता।
आरती घेऊनी आली कौसल्यामाता॥
जय देव जय देव जय निजबोधा रामा।
परमार्थे आरती सद्भावे आरती परिपूर्णकामा॥